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सूचना विभाग से सरकारी विज्ञापन की मलाई बड़े मीडिया घरानों के लिए, छोटे अखबारों के हिस्से में इंतजार- Pramod Tyagi (एडवोकेट) ने खोली छोटे अखबारों के संकट की परतें

Lucknow सरकारी विज्ञापन की मलाई बड़े मीडिया घरानों की प्लेट में और छोटे अखबारों के सामने नियमों, कागजों और इंतजार की थाली—क्या यही है समान अवसर वाली पत्रकारिता? विश्व हिंदू महासंघ भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रमोद त्यागी एडवोकेट ने छोटे और मझोले समाचार पत्रों के सामने खड़े संकट को लेकर सरकार की विज्ञापन नीति और खास तौर पर सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि छोटे अखबारों की परेशानी किसी एक व्यक्ति या एक संस्था की देन नहीं है, बल्कि ऐसी पूरी व्यवस्था बन गई है जिसमें सरकारी विज्ञापन से लेकर डिजिटल बाजार तक बड़े और छोटे मीडिया के बीच आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है।

देश में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन छोटे और मझोले समाचार पत्रों की हालत देखकर कभी-कभी लगता है कि इस चौथे स्तंभ के लिए भी कोई अलग से ‘मेंटेनेंस बजट’ होना चाहिए था। बड़े मीडिया घरानों की चमकदार इमारतें, विशाल विज्ञापन अभियान और मजबूत कॉरपोरेट नेटवर्क देखकर मीडिया की तस्वीर काफी शानदार दिखाई देती है, लेकिन उसी तस्वीर के दूसरे कोने में छोटे अखबार हैं, जो सीमित संसाधनों में अपना संस्करण निकालने, पत्रकारों को भुगतान करने, कागज खरीदने और सरकारी विज्ञापन का इंतजार करने के बीच लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

विश्व हिंदू महासंघ भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रमोद त्यागी एडवोकेट ने छोटे और मझोले समाचार पत्रों के सामने खड़े इसी संकट पर सरकार की नीतियों और पूरे मीडिया इकोसिस्टम पर तीखी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि इस संकट के पीछे केवल एक कारण नहीं है। सरकार की विज्ञापन नीतियां, बड़े मीडिया घरानों की आर्थिक ताकत, डिजिटल टेक कंपनियों का बढ़ता प्रभाव, न्यूजप्रिंट की महंगाई और छोटे समाचार पत्रों की अपनी कुछ कमजोरियां—इन सबने मिलकर ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है, जिसमें छोटे प्रकाशनों के सामने अस्तित्व का सवाल खड़ा होता जा रहा है।

सरकारी विज्ञापन नीति पर प्रमोद त्यागी का सीधा सवाल—नियम बराबर हैं तो अवसर भी बराबर हैं क्या?

Pramod Tyagi (एडवोकेट) के अनुसार छोटे समाचार पत्रों के संकट का सबसे बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापन व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा बड़े मीडिया घरानों तक पहुंचता है, जबकि छोटे और क्षेत्रीय समाचार पत्रों को विज्ञापन हासिल करने के लिए लंबी प्रक्रियाओं, औपचारिकताओं और इंतजार से गुजरना पड़ता है। नियमों और पात्रता की बात हर जगह होती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तविक अवसर भी उतने ही समान हैं?

व्यंग्य यहीं से शुरू होता है। बड़े मीडिया संस्थानों के पास संसाधन हैं, कर्मचारी हैं, विज्ञापन विभाग हैं, कानूनी और वित्तीय टीमें हैं और लंबे समय तक भुगतान अटकने की स्थिति में भी काम चलाने की क्षमता है। दूसरी तरफ छोटा अखबार है, जहां कई बार सीमित कर्मचारियों के साथ पूरा प्रकाशन चलाया जाता है। फिर दोनों को एक ही तराजू पर रखकर कहा जाता है—प्रतिस्पर्धा कीजिए। यानी एक तरफ हाथी और दूसरी तरफ साइकिल, और फिर व्यवस्था कहती है कि दौड़ निष्पक्ष है।

प्रमोद त्यागी एडवोकेट का सवाल इसी असमानता को लेकर है। उनका कहना है कि छोटे समाचार पत्रों के लिए सरकारी विज्ञापन केवल कारोबारी लाभ नहीं होते, बल्कि कई प्रकाशनों के लिए वे नियमित संचालन का महत्वपूर्ण आर्थिक आधार होते हैं। यदि विज्ञापन समय पर नहीं मिलता या अपेक्षित मात्रा में नहीं मिलता तो उसका असर सीधे अखबार के संचालन पर पड़ता है।

सरकारी विज्ञापन का पैसा अटक जाए तो छोटे अखबार की सांस भी अटक जाती है

सरकारी विज्ञापन जारी होना एक बात है और उसका भुगतान वास्तव में मिलना दूसरी बात। छोटे समाचार पत्रों के सामने समस्या यहीं से और गंभीर हो जाती है। अखबार रोज निकलता है, कागज रोज चाहिए, कर्मचारियों का भुगतान समय पर करना पड़ता है, प्रिंटिंग का खर्च चलता रहता है, लेकिन विज्ञापन का भुगतान कब मिलेगा—यह इंतजार कई बार लंबा हो जाता है।

प्रमोद त्यागी एडवोकेट के अनुसार सरकारी विज्ञापनों के भुगतान में देरी छोटे समाचार पत्रों के लिए गंभीर कैश-फ्लो संकट पैदा करती है। बड़े मीडिया संस्थान इस तरह के झटके को अपनी आर्थिक क्षमता के कारण कुछ हद तक सह सकते हैं, लेकिन छोटे प्रकाशनों के लिए लंबे समय तक भुगतान अटकना सीधे उनके अस्तित्व को प्रभावित कर सकता है।

और यहां व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर अखबार को अपना कागज खरीदने के लिए यह कहकर तो नहीं चलाया जा सकता कि ‘सरकारी बिल प्रक्रिया में है।’ प्रिंटिंग प्रेस वाला भी यह नहीं कहेगा कि ‘कोई बात नहीं, विज्ञापन का भुगतान जब आएगा तब पैसे दे देना।’ पत्रकार भी हमेशा यह सुनकर काम नहीं कर सकता कि ‘अभी बजट नहीं आया, अगले महीने देखेंगे।’ खर्च की दुनिया में हर चीज समय पर चाहिए, लेकिन भुगतान की दुनिया में फाइल अपनी सुविधा से चलती रहे—यह विरोधाभास छोटे प्रकाशनों को भारी पड़ता है।

उत्तर प्रदेश का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग—छोटे अखबारों के लिए सवाल यहीं से और बड़ा होता है

उत्तर प्रदेश में छोटे और क्षेत्रीय समाचार पत्रों की चर्चा हो और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, UP की भूमिका पर सवाल न उठे, ऐसा मुश्किल है। सरकारी योजनाओं, उपलब्धियों और विभागीय गतिविधियों को जनता तक पहुंचाने में सूचना तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी वजह से प्रमोद त्यागी एडवोकेट ने उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की विज्ञापन व्यवस्था को लेकर भी तीखे सवाल उठाए हैं।

उनका कहना है कि विभाग को यह देखना चाहिए कि सरकारी विज्ञापन वितरण की व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है और छोटे समाचार पत्रों के लिए कितनी व्यावहारिक। केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उन नियमों का वास्तविक प्रभाव छोटे प्रकाशनों पर क्या पड़ रहा है।

प्रमोद त्यागी का सवाल है कि यदि छोटे समाचार पत्र सरकार की योजनाओं और स्थानीय घटनाओं को जनता तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं तो फिर सरकारी विज्ञापन नीति में उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर अधिक संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई जाती? यदि किसी छोटे अखबार को विज्ञापन के लिए बार-बार दस्तावेज, पात्रता और प्रक्रिया के चक्कर लगाने पड़ें, फिर विज्ञापन मिले तो भुगतान के लिए इंतजार करना पड़े, तो आखिर वह अपने कर्मचारियों और प्रिंटिंग खर्च को कैसे संभाले?

व्यंग्यात्मक स्थिति यह है कि सरकार को अपनी उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया चाहिए, लेकिन जब उसी मीडिया को आर्थिक रूप से टिकाए रखने की बात आती है तो छोटे अखबारों के सामने नियमों की पूरी किताब खोल दी जाती है। बड़े संस्थानों के पास संसाधनों का पहाड़ है और छोटे प्रकाशक के पास फाइलों का पहाड़।

सूचना विभाग से सवाल—विज्ञापन बांटना ही जिम्मेदारी है या छोटे मीडिया को समझना भी?

प्रमोद त्यागी एडवोकेट का कहना है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग जैसे संस्थानों की भूमिका केवल विज्ञापन जारी करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें स्थानीय और क्षेत्रीय पत्रकारिता की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझना चाहिए।

छोटे अखबारों का आर्थिक मॉडल बड़े मीडिया समूहों से अलग होता है। यहां सीमित सर्कुलेशन, सीमित विज्ञापन और सीमित पूंजी के बावजूद प्रकाशन जारी रखना पड़ता है। इसलिए सरकारी विज्ञापन में थोड़ी सी देरी भी छोटे प्रकाशन के लिए बड़ी समस्या बन सकती है।

यहीं सवाल उठता है कि क्या सरकारी विज्ञापन नीति का मूल्यांकन केवल कागजी पात्रता के आधार पर किया जाता है या उसके वास्तविक आर्थिक प्रभाव को भी देखा जाता है?

अगर छोटे अखबार लगातार आर्थिक संकट में जाएंगे, तो इसका असर केवल उनके मालिक या प्रकाशक पर नहीं पड़ेगा। स्थानीय पत्रकारों, रिपोर्टरों, प्रिंटिंग कर्मचारियों, वितरण से जुड़े लोगों और सबसे बढ़कर स्थानीय समाचार कवरेज पर भी असर पड़ सकता है।

बड़े मीडिया के लिए बाजार, छोटे अखबारों के लिए परीक्षा—यह कैसा संतुलन?

प्रमोद त्यागी एडवोकेट के मुताबिक बड़े मीडिया समूहों की आर्थिक ताकत छोटे समाचार पत्रों के संकट का एक महत्वपूर्ण कारण है। बड़े संस्थानों के पास भारी पूंजी होती है, जिससे वे आधुनिक प्रिंटिंग मशीनरी, बेहतर तकनीक, बड़ा वितरण नेटवर्क और बड़ी संख्या में पत्रकार एवं अन्य कर्मचारी रख सकते हैं।

छोटा अखबार इस आर्थिक ताकत के सामने कहां खड़ा है? उसके पास सीमित संसाधन हैं और कई बार प्रकाशक खुद संपादन से लेकर प्रबंधन तक की जिम्मेदारी संभालता है।

बड़े संस्थान बड़ी मात्रा में न्यूजप्रिंट खरीद सकते हैं। बड़ी खरीद का फायदा कीमत और आपूर्ति की शर्तों में मिल सकता है। छोटा प्रकाशक इतनी मात्रा में खरीदारी नहीं कर सकता। इसलिए कागज की कीमत बढ़ने का असर उसकी लागत पर कहीं ज्यादा भारी पड़ सकता है।

एक तरफ न्यूजप्रिंट महंगा हो रहा है, दूसरी तरफ विज्ञापन का पारंपरिक बाजार सिकुड़ रहा है और तीसरी तरफ पाठक डिजिटल कंटेंट की ओर बढ़ रहा है। यानी छोटे अखबार को चारों तरफ से दबाव मिल रहा है।

न्यूजप्रिंट की कीमत बढ़ी तो छोटे अखबार ने क्या किया—पन्ने कम करे या घाटा बढ़ाए?

प्रिंट मीडिया में कागज कोई मामूली खर्च नहीं है। अखबार का आकार, पन्नों की संख्या और प्रिंटिंग लागत सीधे न्यूजप्रिंट से जुड़ी होती है। प्रमोद त्यागी एडवोकेट के अनुसार पिछले वर्षों में न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों ने छोटे और मझोले प्रकाशनों की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ाया है।

बड़े मीडिया समूह बड़ी मात्रा में खरीद के कारण बेहतर सौदे कर सकते हैं, लेकिन छोटे अखबारों के पास वह आर्थिक शक्ति नहीं होती। वे कम मात्रा में खरीदते हैं और बाजार की कीमतों का ज्यादा सीधा सामना करते हैं।

नतीजा यह है कि जिस अखबार की विज्ञापन आय पहले ही दबाव में है, उसकी उत्पादन लागत भी बढ़ती जाती है।

डिजिटल कंपनियों ने विज्ञापन बाजार की दिशा बदल दी

प्रमोद त्यागी एडवोकेट के अनुसार छोटे समाचार पत्रों के संकट को समझने के लिए डिजिटल क्रांति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्थानीय व्यापारियों और कंपनियों के विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा अब डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा रहा है।

Google, Meta के Facebook और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म विज्ञापनदाताओं को ऐसे डिजिटल विकल्प देते हैं जिनमें उन्हें लक्षित दर्शकों तक पहुंचने और अभियान के परिणामों को मापने की सुविधा मिलती है। इसके कारण पारंपरिक प्रिंट विज्ञापन पर दबाव बढ़ा है।

पहले स्थानीय व्यापारी अखबार में विज्ञापन देकर अपने क्षेत्र के पाठकों तक पहुंचता था। अब वह सोशल मीडिया पर विज्ञापन चला सकता है, वीडियो बना सकता है और सीधे संभावित ग्राहकों तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है।

छोटे अखबार के लिए यह एक बिल्कुल नई प्रतिस्पर्धा है।

पहले मुकाबला दूसरे अखबार से था।

अब मुकाबला मोबाइल स्क्रीन से है।

पाठक बोला—खबर मुफ्त चाहिए, अखबार बोले—फिर खर्च कौन उठाएगा?

डिजिटल मीडिया ने पाठकों की आदतों को भी बदल दिया है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर लगातार मुफ्त खबरें उपलब्ध होने के कारण बड़ी संख्या में पाठक खबरों के लिए भुगतान करने की जरूरत कम महसूस करते हैं।

लेकिन खबर मुफ्त दिखाई देने का मतलब यह नहीं कि उसे तैयार करने में कोई लागत नहीं आई।

पत्रकार मौके पर जाता है, जानकारी जुटाता है, स्रोतों से बात करता है, खबर लिखता है, संपादकीय प्रक्रिया से गुजरती है और फिर उसे प्रकाशित किया जाता है। प्रिंट संस्करण में इसके ऊपर कागज, प्रिंटिंग और वितरण का खर्च जुड़ जाता है।

छोटे अखबारों के लिए यह पूरा मॉडल तब मुश्किल हो जाता है जब पाठक मुफ्त डिजिटल खबर का आदी हो जाए और विज्ञापनदाता अपना पैसा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भेजने लगे।

फिर अखबार के पास बचता क्या है?

साख और संघर्ष।

और दोनों से बिजली का बिल नहीं भरता।

प्रमोद त्यागी ने छोटे अखबारों की अपनी गलतियों पर भी उठाई उंगली

दिलचस्प बात यह है कि प्रमोद त्यागी एडवोकेट ने समस्या के लिए केवल सरकार और बड़े कॉरपोरेट मीडिया को जिम्मेदार नहीं ठहराया। उन्होंने छोटे और मझोले समाचार पत्रों की आंतरिक कमियों को भी इस संकट का हिस्सा बताया है।

उनके अनुसार कई छोटे समाचार पत्र डिजिटल बदलाव के साथ समय पर खुद को नहीं बदल पाए। वेबसाइट, सोशल मीडिया, मोबाइल प्लेटफॉर्म और डिजिटल पत्रकारिता की जरूरतों को कई संस्थानों ने देर से समझा।

जब पाठक मोबाइल पर चला गया, कई अखबार अभी भी केवल प्रिंट संस्करण पर निर्भर रहे। जब सोशल मीडिया पर खबरें तेजी से फैलने लगीं, कई प्रकाशनों ने अपनी डिजिटल उपस्थिति मजबूत करने में पर्याप्त गति नहीं दिखाई।

इसका मतलब साफ है—सिर्फ सरकार को दोष देकर छोटा अखबार नहीं बचेगा।

लेकिन इसका दूसरा मतलब यह भी है कि सरकार अपनी नीतियों से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग ने पूरी बिरादरी की साख को चोट पहुंचाई

प्रमोद त्यागी एडवोकेट ने छोटे समाचार पत्रों से जुड़ी एक बेहद संवेदनशील और कड़वी समस्या की ओर भी इशारा किया है। उनका कहना है कि कुछ लोगों ने पत्रकारिता को सरकारी विज्ञापन हासिल करने या स्थानीय अधिकारियों पर दबाव बनाकर आर्थिक लाभ लेने का माध्यम बना लिया।

यदि ऐसा होता है तो नुकसान केवल उस व्यक्ति या संस्थान तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरी पत्रकारिता बिरादरी की विश्वसनीयता पर पड़ता है।

ईमानदारी से काम करने वाला पत्रकार भी सवालों के घेरे में आ सकता है। वास्तविक समाचार पत्र भी संदेह की नजर से देखा जा सकता है। और फिर सरकार के पास भी सख्ती के लिए एक अतिरिक्त आधार तैयार हो जाता है।

इसलिए प्रमोद त्यागी एडवोकेट का कहना है कि छोटे समाचार पत्रों को अपनी साख के मामले में भी गंभीर होना होगा।

सरकार से सवाल भी और छोटे अखबारों से आत्ममंथन भी

प्रमोद त्यागी एडवोकेट की बात का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि वे पूरे संकट को एक ही खांचे में नहीं रखते। उनका कहना है कि सरकार की विज्ञापन नीति पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन छोटे समाचार पत्रों को भी अपने भीतर सुधार करना होगा।

सरकार को विज्ञापन वितरण में पारदर्शिता बढ़ानी होगी।

भुगतान में अनावश्यक देरी रोकनी होगी।

सूचना एवं जनसंपर्क विभागों को छोटे और क्षेत्रीय समाचार पत्रों के प्रति अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।

वहीं छोटे समाचार पत्रों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मजबूती से उतरना होगा, पत्रकारिता की गुणवत्ता सुधारनी होगी और अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी होगी।

क्योंकि अखबार सिर्फ सरकारी विज्ञापन से नहीं चलता, लेकिन सरकारी विज्ञापन को पूरी तरह नजरअंदाज करके भी कई छोटे अखबारों के लिए चलना आसान नहीं है।

अब सरकार के सामने असली सवाल

प्रमोद त्यागी एडवोकेट की टिप्पणी सरकार के सामने कई सवाल खड़े करती है। क्या सरकारी विज्ञापन वितरण की व्यवस्था को इस तरह बनाया जा सकता है कि छोटे और बड़े प्रकाशनों के बीच आर्थिक असमानता को भी ध्यान में रखा जाए? क्या भुगतान के लिए स्पष्ट समयसीमा हो सकती है? क्या उत्तर प्रदेश का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग छोटे प्रकाशनों के लिए प्रक्रियाओं को अधिक सरल और पारदर्शी बना सकता है? क्या विज्ञापन वितरण की जानकारी सार्वजनिक रूप से अधिक स्पष्ट तरीके से उपलब्ध हो सकती है? और क्या छोटे समाचार पत्रों को डिजिटल संक्रमण के दौर में केवल बाजार के भरोसे छोड़ दिया जाना चाहिए?

इन सवालों के जवाब सरकार और संबंधित विभागों को देने होंगे।

क्योंकि छोटे अखबारों को सिर्फ यह बताना आसान है कि “डिजिटल हो जाइए।”

लेकिन डिजिटल होने के लिए वेबसाइट चाहिए, तकनीक चाहिए, कर्मचारी चाहिए, सर्वर चाहिए, सोशल मीडिया टीम चाहिए और सबसे जरूरी—निरंतर निवेश चाहिए।

अगर एक छोटे प्रकाशन की आय ही लगातार दबाव में है तो वह यह निवेश कहां से करेगा?

लोकतंत्र में छोटी आवाज को सिर्फ इसलिए छोटा नहीं माना जा सकता क्योंकि उसका सर्कुलेशन छोटा है

प्रमोद त्यागी एडवोकेट का मूल सवाल यही है कि छोटे समाचार पत्रों को केवल उनके आर्थिक आकार से नहीं देखा जाना चाहिए। स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय स्तर के बड़े मीडिया समूह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर छोटे समाचार पत्रों की अपनी भूमिका है। वे उन मुद्दों को सामने ला सकते हैं जिन्हें राष्ट्रीय मीडिया की प्राथमिकता नहीं मिलती।

यही कारण है कि यदि छोटे समाचार पत्र आर्थिक संकट में लगातार कमजोर होते हैं तो समस्या केवल मीडिया व्यवसाय की नहीं रह जाती।

यह स्थानीय सूचना व्यवस्था की समस्या भी बन जाती है।

और अगर सरकारी विज्ञापन नीति, डिजिटल बदलाव, न्यूजप्रिंट की लागत और छोटे प्रकाशनों की आंतरिक समस्याएं एक साथ दबाव बनाती रहीं, तो आने वाले समय में छोटे समाचार पत्रों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि “अखबार कैसे चलाएं?”

सवाल यह भी होगा कि “अखबार निकालने की जरूरत और क्षमता दोनों कैसे बचाई जाए?”

Pramod Tyagi (एडवोकेट)  ने जिस इकोसिस्टम की बात कही है, उसमें सरकार की जिम्मेदारी सबसे बड़ी निगरानी के सवालों में से एक है। सूचना एवं जनसंपर्क विभागों को यह साबित करना होगा कि सरकारी विज्ञापन वास्तव में पारदर्शी प्रक्रिया के तहत वितरित हो रहे हैं और छोटे समाचार पत्र केवल नियमों की किताब में मौजूद पात्र संस्थान नहीं, बल्कि जमीनी पत्रकारिता का हिस्सा भी हैं। दूसरी ओर छोटे प्रकाशनों को भी यह साबित करना होगा कि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ विज्ञापन हासिल करना नहीं, बल्कि विश्वसनीय खबर देना है। बड़े मीडिया के पास पैसा है, डिजिटल कंपनियों के पास तकनीक है और छोटे समाचार पत्रों के पास स्थानीय पहुंच—अब सवाल यह है कि सरकारी नीति इस पूरी व्यवस्था में संतुलन पैदा करती है या फिर छोटे अखबारों को हर बार वही पुराना जवाब मिलता रहेगा—पहले आवेदन कीजिए, फिर इंतजार कीजिए।