pramod

किसानों की कर्ज माफी पर प्रमोद त्यागी ने उठाए सवाल, बोले- राहत के नाम पर कहीं नया कर्ज जाल तो नहीं?

उत्तर प्रदेश। किसानों की कर्ज माफी को लेकर राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने सरकार की घोषणाओं पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कर्ज माफी के नाम पर की जाने वाली घोषणाएं किसानों को कुछ समय के लिए राहत तो दे सकती हैं, लेकिन यदि खेती से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो किसान दोबारा कर्ज के उसी चक्र में फंस सकते हैं। उन्होंने ऐसी घोषणाओं को लेकर आशंका जताई कि चुनाव के दौरान किए गए वादे कहीं केवल राजनीतिक आकर्षण बनकर न रह जाएं।

प्रमोद त्यागी के मुताबिक, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केवल कर्ज माफ करने की घोषणा पर्याप्त नहीं है। खेती की बढ़ती लागत, फसलों का उचित मूल्य, सिंचाई की उपलब्धता और कृषि से होने वाली आय जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उनका तर्क है कि जब तक इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होगा, तब तक कर्ज माफी किसानों की परेशानी को कुछ समय के लिए टालने तक सीमित रह सकती है।

कर्ज माफी की घोषणा से राहत या फिर नया आर्थिक चक्र?

प्रमोद त्यागी ने कहा कि किसान कर्ज माफी को अक्सर तत्काल राहत के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। प्राकृतिक आपदा, सूखा, बाढ़ या फसल खराब होने की स्थिति में किसान की आमदनी प्रभावित होती है। ऐसे समय में कर्ज का बोझ बढ़ने से परिवार की आर्थिक स्थिति और खेती दोनों पर दबाव पड़ता है। कर्ज माफी से इस दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है, लेकिन यह अपने आप में कृषि संकट का स्थायी समाधान नहीं है।

उनका कहना है कि यदि किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता और खाद, बीज, डीजल, बिजली, मशीनरी तथा मजदूरी पर खर्च लगातार बढ़ता रहता है, तो कर्ज से मिली राहत ज्यादा समय तक कायम नहीं रह पाएगी। अगली फसल की बुवाई, सिंचाई और दूसरी कृषि जरूरतों के लिए किसान को फिर से धन की आवश्यकता होगी। पर्याप्त आय नहीं होने पर उसे दोबारा ऋण लेना पड़ सकता है। इस तरह कर्ज माफी के बाद भी आर्थिक परेशानी का चक्र जारी रह सकता है।

हालांकि, कर्ज माफी का प्रभाव हर किसान और हर योजना के लिए समान नहीं होता। प्राकृतिक आपदा से प्रभावित या गंभीर आर्थिक संकट झेल रहे किसानों के लिए यह राहत महत्वपूर्ण हो सकती है। सवाल इस बात का है कि ऐसी सहायता कितनी व्यापक, पारदर्शी और जरूरतमंद किसानों तक पहुंचने वाली है तथा इसके साथ कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक समस्याओं के समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

योजनाओं की शर्तों से छूट सकते हैं जरूरतमंद किसान

प्रमोद त्यागी ने कर्ज माफी योजनाओं में लागू होने वाली शर्तों को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि कई योजनाओं में ऋण के प्रकार, बैंक, कर्ज की अधिकतम सीमा और पात्रता से संबंधित नियम निर्धारित किए जाते हैं। ऐसे में सभी कर्जदार किसानों को समान रूप से लाभ मिलना जरूरी नहीं होता। यदि योजना का दायरा सीमित है, तो आर्थिक संकट से जूझ रहे कुछ किसान भी सहायता से बाहर रह सकते हैं।

कर्ज माफी की किसी भी योजना का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि पात्रता के नियम क्या हैं, किसानों की पहचान किस प्रकार की जाती है और सहायता कितनी जल्दी उनके खातों या ऋण खातों तक पहुंचती है। इसलिए योजना की घोषणा के साथ-साथ उसके क्रियान्वयन की स्पष्ट व्यवस्था भी आवश्यक है। किसानों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि वे किन शर्तों के तहत लाभ प्राप्त कर सकते हैं और आवेदन या सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी।

त्यागी का सवाल है कि यदि किसी किसान पर कर्ज का दबाव है, लेकिन वह निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करता, तो उसकी समस्या का समाधान किस तरह होगा। उनके अनुसार, किसान कल्याण से जुड़ी नीतियों में वास्तविक जरूरत और आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि सहायता केवल कागजों तक सीमित न रह जाए।

कर्ज माफी के बाद बैंक से नया ऋण मिलने की चिंता

किसानों के सामने एक अन्य चुनौती भविष्य में खेती के लिए वित्तीय सहायता जुटाने की भी हो सकती है। प्रमोद त्यागी ने आशंका जताई कि कर्ज माफी के बाद कुछ किसानों को आगे नया ऋण लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इसका प्रभाव संबंधित बैंक, ऋण के रिकॉर्ड, योजना की प्रकृति और किसान की वित्तीय स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर कर्ज माफी के बाद सभी किसानों को नया ऋण मिलने में परेशानी होती है।

खेती में हर मौसम में पूंजी की जरूरत होती है। बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, कृषि उपकरण और मजदूरी जैसे खर्चों के लिए किसान अक्सर संस्थागत ऋण पर निर्भर रहते हैं। यदि किसी किसान की बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंच प्रभावित होती है या उसे समय पर ऋण नहीं मिलता, तो उसकी अगली फसल की तैयारी पर असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में किसान अनौपचारिक स्रोतों से धन लेने के लिए मजबूर हो सकता है, जहां ब्याज और भुगतान की शर्तें अधिक कठिन हो सकती हैं।

इसी कारण कृषि ऋण नीति में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि राहत प्राप्त करने वाले किसानों की भविष्य की वित्तीय जरूरतें भी ध्यान में रखी जाएं। कर्ज माफी के साथ समय पर संस्थागत ऋण, उचित शर्तों पर वित्तीय सहायता और किसानों को उनकी आय बढ़ाने में मदद देने वाली व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं।

एमएसपी, बढ़ती लागत और सिंचाई जैसे मुद्दों पर स्थायी समाधान की जरूरत

प्रमोद त्यागी ने कृषि संकट की जड़ में मौजूद समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), खेती की बढ़ती लागत और सिंचाई की उपलब्धता जैसे मुद्दों को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, जब किसान की उत्पादन लागत बढ़ती है, लेकिन उपज बेचने से मिलने वाली आमदनी उसके खर्च और परिवार की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती, तो आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता है। ऐसे में कर्ज माफी के साथ-साथ खेती को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना भी जरूरी है।

एमएसपी और फसलों के लाभकारी मूल्य को लेकर किसानों की चिंताएं लंबे समय से चर्चा का विषय रही हैं। किसान की आमदनी केवल घोषित मूल्य पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसकी फसल की खरीद किस कीमत पर और कितनी मात्रा में होती है। इसके अलावा बाजार तक पहुंच, भंडारण की सुविधा, परिवहन खर्च और बिचौलियों की भूमिका भी किसानों की वास्तविक आय को प्रभावित कर सकती है।

सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने पर किसान मानसून पर अधिक निर्भर रहता है। बारिश में कमी या मौसम में अचानक बदलाव से फसल प्रभावित होने का जोखिम बढ़ जाता है। दूसरी ओर, डीजल, बिजली और सिंचाई के दूसरे साधनों पर होने वाला खर्च भी खेती की लागत बढ़ा सकता है। इसलिए जल प्रबंधन, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और मौसम संबंधी जानकारी की उपलब्धता जैसे उपाय किसानों की आर्थिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसी तरह, बेहतर भंडारण, कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, बाजार तक सीधी पहुंच और फसल विविधीकरण जैसे कदम भी किसानों को बेहतर आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं। ऐसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह होना चाहिए कि किसान को केवल संकट के समय राहत देने के बजाय उसकी आय और आर्थिक स्थिरता को मजबूत किया जाए।

चुनावी घोषणाओं और जमीन पर क्रियान्वयन के बीच अंतर पर सवाल

राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने चुनाव के समय किसानों की कर्ज माफी से जुड़ी घोषणाओं को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि कई बार बड़ी घोषणाएं किसानों के बीच उम्मीद पैदा करती हैं, लेकिन उनके वास्तविक लाभ का आकलन योजना के लागू होने के बाद ही किया जा सकता है। यदि घोषणा के बाद पात्रता, बजट, प्रक्रिया और समयसीमा स्पष्ट नहीं होती, तो किसानों के सामने अनिश्चितता बनी रह सकती है।

किसानों के लिए यह जानना जरूरी है कि सरकार की ओर से घोषित राहत वास्तव में किसे मिलेगी, कितनी राशि तक मिलेगी और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या होगी। किसी योजना की सफलता केवल घोषणा से नहीं, बल्कि उसके पारदर्शी क्रियान्वयन, लाभार्थियों तक पहुंच और किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव से तय होती है।

इस मुद्दे पर जवाबदेही भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी योजना का लाभ अपेक्षित किसानों तक नहीं पहुंचता, तो उसकी समीक्षा की जानी चाहिए। पात्रता से बाहर रह गए जरूरतमंद किसानों की समस्याओं को समझना और योजना की कमियों को दूर करना प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए। किसानों से जुड़े वादों और नीतियों के परिणामों का आकलन तथ्यों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

किसानों को राहत के साथ मजबूत आर्थिक आधार भी मिले

किसानों की कर्ज माफी पर बहस का मुख्य सवाल यही है कि क्या इससे उनकी आर्थिक समस्याओं का स्थायी समाधान हो सकता है। कर्ज माफी संकट की स्थिति में राहत का एक माध्यम हो सकती है, लेकिन इसे व्यापक कृषि नीति का विकल्प नहीं माना जा सकता। खेती की लागत, फसल की कीमत, मौसम संबंधी जोखिम, सिंचाई, बाजार और संस्थागत ऋण तक पहुंच जैसे मुद्दों पर एक साथ काम करने की जरूरत है।

कृषि क्षेत्र में लंबे समय तक सुधार के लिए किसानों को समय पर और किफायती ऋण, फसल खराब होने पर प्रभावी सहायता, उचित बाजार व्यवस्था तथा आधुनिक कृषि तकनीकों तक पहुंच उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। इसके साथ योजनाओं की पात्रता और लाभ वितरण की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि सहायता वास्तव में उन किसानों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

प्रमोद त्यागी की ओर से उठाए गए सवाल सरकार की कृषि नीतियों और कर्ज माफी की घोषणाओं के प्रभाव पर चर्चा को सामने लाते हैं। इन सवालों का मूल्यांकन किसी योजना की वास्तविक शर्तों, बजट, क्रियान्वयन और किसानों को मिले लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए। किसानों के हित में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उन्हें संकट के समय राहत मिलने के साथ ऐसी व्यवस्था भी मिले, जिससे वे बार-बार कर्ज लेने की मजबूरी से बाहर निकल सकें।

प्रमोद त्यागी ने किसानों की कर्ज माफी की घोषणाओं पर सवाल उठाते हुए कृषि संकट के स्थायी समाधान की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि केवल कर्ज माफी से किसानों की परेशानी हमेशा के लिए दूर नहीं होगी। किसानों को वास्तविक राहत तभी मिल सकती है, जब उन्हें उपज का लाभकारी मूल्य, खेती की लागत से राहत, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और समय पर संस्थागत ऋण जैसी सुविधाएं भी मिलें।

हाल ही में 12 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाढ़, भारी बारिश और ओलावृष्टि से प्रभावित राज्य के 9,18,091 किसानों के बैंक खातों में ₹483 करोड़ से अधिक की आर्थिक सहायता राशि सीधे ट्रांसफर की है।
• कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाया: सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाकर ₹3.03 लाख करोड़ कर दिया है (जो पहले ₹2.78 लाख करोड़ था)। इसका उद्देश्य किसानों, पशुपालकों और मत्स्य पालकों को साहूकारों के चंगुल से बचाकर आधिकारिक बैंकिंग प्रणाली (KCC) से जोड़ना है।

2. यूपी किसान ऋण मोचन योजना (पुरानी योजना के नियम)

यदि आप 2017 में लागू की गई पुरानी ऋण मोचन योजना के नियमों और पात्रता को समझना चाहते हैं, तो इसकी प्रमुख शर्तें नीचे दी गई तालिका में दी गई हैं:

मुख्य विशेषता विवरण
योजना का नाम उत्तर प्रदेश किसान ऋण मोचन योजना
माफी की सीमा लघु और सीमांत किसानों के लिए अधिकतम ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) तक का फसली ऋण।
लोन की कट-ऑफ तारीख केवल 31 मार्च 2016 तक या उससे पहले के बकाया फसली ऋण (Crop Loan)। इसके बाद लिए गए नए लोन इसके तहत माफ नहीं होते।
भूमि की सीमा किसान के पास अधिकतम 2 हेक्टेयर (लघु किसान) या 1 हेक्टेयर (सीमांत किसान) तक की कृषि भूमि होनी चाहिए।
बैंकों की पात्रता केवल राष्ट्रीयकृत (Scheduled), सहकारी (Cooperative), या क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) से लिया गया लोन। निजी साहूकारों का ऋण इसमें शामिल नहीं है।
आधिकारिक पोर्टल upkisankarjrahat.upsdc.gov.in